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हवाई यात्रियों को बड़ी राहत, एटीएफ कीमतों को स्थिर रखने के लिए केंद्र की 10,000 करोड़ की योजना

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केंद्र सरकार ने विमानन टर्बाइन ईंधन (ATF) की कीमतों में अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये की मूल्य स्थिरीकरण योजना शुरू की है। इससे एयरलाइनों के परिचालन खर्च और हवाई किरायों पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है।

देश के विमानन क्षेत्र और हवाई यात्रियों के लिए केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और विमानन ईंधन की कीमतों में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव के बीच सरकार ने विमानन टर्बाइन ईंधन (ATF) की कीमतों को नियंत्रित और स्थिर रखने के उद्देश्य से 10,000 करोड़ रुपये की विशेष मूल्य स्थिरीकरण योजना लागू करने का फैसला किया है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से घरेलू एयरलाइनों को वित्तीय स्थिरता मिलेगी और यात्रियों को अचानक बढ़ने वाले हवाई किरायों से राहत मिल सकेगी।

मंगलवार को सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने विमानन टर्बाइन ईंधन की कीमतों में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की घोषणा की। नई दरें लागू होने के बाद घरेलू एयरलाइनों के लिए जेट ईंधन की कीमत बढ़कर लगभग 115 रुपये प्रति लीटर हो गई है। हालांकि सरकार की नई व्यवस्था के तहत भाग लेने वाली एयरलाइनों को आने वाले वर्षों में मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा मिलने की उम्मीद है।

क्यों जरूरी हुई नई योजना?

पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध जैसी परिस्थितियों और कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधाओं के कारण ईंधन बाजार में भारी अस्थिरता देखी गई है। इसका सीधा असर विमानन क्षेत्र पर पड़ा है क्योंकि एयरलाइनों के कुल परिचालन खर्च का बड़ा हिस्सा ईंधन पर खर्च होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी एयरलाइन के कुल संचालन व्यय में एटीएफ की हिस्सेदारी सामान्य परिस्थितियों में लगभग 40 प्रतिशत तक होती है। कई बार अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान यह अनुपात 60 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। ऐसे समय में एयरलाइनों को बढ़ी हुई लागत का बोझ यात्रियों पर डालना पड़ता है, जिससे हवाई यात्रा महंगी हो जाती है।

इसी चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने मूल्य स्थिरीकरण तंत्र तैयार किया है ताकि एयरलाइनों को भविष्य की लागत का बेहतर अनुमान लगाने में मदद मिल सके और वे बार-बार किराए बढ़ाने के लिए मजबूर न हों।

योजना के तहत कैसे काम करेगी व्यवस्था?

नई व्यवस्था पूरी तरह स्वैच्छिक रखी गई है। यानी एयरलाइनों पर इसमें शामिल होने का कोई दबाव नहीं होगा। जो कंपनियां इस योजना का हिस्सा बनना चाहेंगी, उन्हें निर्धारित आधार मूल्य पर ईंधन उपलब्ध कराया जाएगा।

सरकार ने एक निश्चित बेंचमार्क मूल्य तय किया है, जिसके आधार पर योजना में शामिल एयरलाइनों को ईंधन उपलब्ध होगा। इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक होने वाली तेजी या गिरावट के जोखिम से काफी हद तक सुरक्षा मिल सकेगी।

जो एयरलाइंस इस योजना में शामिल नहीं होंगी, उन्हें बाजार आधारित मूल्य पर ही ईंधन खरीदना होगा। ऐसे वाहकों को कीमतों में गिरावट का फायदा मिल सकता है, लेकिन वैश्विक बाजार में तेजी आने पर उन्हें अधिक लागत का सामना करना पड़ेगा।

एयरलाइनों को क्या मिलेगा फायदा?

विमानन क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि ईंधन लागत में स्थिरता आने से एयरलाइनों को अपनी वित्तीय योजना बेहतर तरीके से बनाने का अवसर मिलेगा। वर्तमान में एयरलाइनों को सबसे बड़ी चुनौती ईंधन कीमतों की अनिश्चितता होती है।

यदि किसी कंपनी को पहले से पता होगा कि अगले कुछ वर्षों तक उसे लगभग निश्चित दर पर ईंधन उपलब्ध होगा, तो वह अपनी उड़ान योजनाओं, टिकट मूल्य निर्धारण और विस्तार कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित कर सकेगी।

इससे छोटे और मध्यम स्तर की एयरलाइनों को भी राहत मिलने की उम्मीद है, जो ईंधन मूल्य वृद्धि से सबसे अधिक प्रभावित होती हैं।

तेल कंपनियों को कैसे मिलेगा सहारा?

पिछले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद कई बार घरेलू स्तर पर एटीएफ की दरों में सीमित बदलाव किया गया था। इसका असर सरकारी तेल विपणन कंपनियों की आय पर पड़ा।

नई योजना के तहत सरकार और तेल कंपनियों के बीच ऐसा तंत्र विकसित किया गया है जिससे कंपनियों पर अत्यधिक वित्तीय दबाव नहीं पड़ेगा। यदि वैश्विक कीमतें निर्धारित आधार मूल्य से ऊपर जाती हैं तो अंतर की भरपाई के लिए सरकार सहायता उपलब्ध करा सकेगी।

इससे सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति भी मजबूत बनी रहेगी और उन्हें लगातार घाटे का सामना नहीं करना पड़ेगा।

यात्रियों के लिए सबसे बड़ा लाभ क्या?

आम यात्रियों के लिए इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू हवाई किरायों में स्थिरता है। जब ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो एयरलाइंस अक्सर टिकट दरों में वृद्धि कर देती हैं। त्योहारों, छुट्टियों या यात्रा सीजन के दौरान इसका असर और अधिक दिखाई देता है।

सरकार का मानना है कि यदि एयरलाइनों को ईंधन मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी तो वे किराए में अचानक बड़ी बढ़ोतरी करने से बच सकेंगी। इससे यात्रियों को अधिक अनुमानित और संतुलित किराया संरचना का लाभ मिलेगा।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि टिकट किराया केवल ईंधन कीमतों पर निर्भर नहीं करता। मांग, हवाई अड्डा शुल्क, कर और अन्य परिचालन लागत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिर भी ईंधन लागत नियंत्रित रहने से किराया वृद्धि के दबाव में कमी आ सकती है।

विमानन क्षेत्र को मिलेगा नया आधार

भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते विमानन बाजारों में शामिल है। हर वर्ष लाखों नए यात्री हवाई यात्रा से जुड़ रहे हैं। ऐसे में सरकार की यह पहल विमानन क्षेत्र को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल रहता है तो भविष्य में अन्य ऊर्जा आधारित क्षेत्रों के लिए भी इसी तरह की स्थिरीकरण व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।

सरकार का उद्देश्य केवल एयरलाइनों को राहत देना नहीं बल्कि पूरे विमानन तंत्र को अधिक मजबूत, प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ बनाना है। इससे निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा और विमानन क्षेत्र के विस्तार को नई गति मिल सकती है।

आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण फैसला

विमानन उद्योग पर्यटन, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। हवाई यात्रा जितनी सुलभ और किफायती होगी, उसका सकारात्मक प्रभाव अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ेगा।

नई एटीएफ मूल्य स्थिरीकरण योजना को इसी व्यापक दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। सरकार को उम्मीद है कि इससे एयरलाइनों की लागत में संतुलन आएगा, तेल कंपनियों को सुरक्षा मिलेगी और यात्रियों को अपेक्षाकृत स्थिर किराए का लाभ प्राप्त होगा।

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